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तोमर राजवंश का इतिहास | Tomar Rajput History

Tomar Rajput History: तोमर (जिन्हें तोमर, तनवर और तुअर भी कहा जाता है) एक हिंदू कुल है, जिसके सदस्य विभिन्न समयों पर उत्तर भारत के विभिन्न ...

Tomar Rajput History: तोमर (जिन्हें तोमर, तनवर और तुअर भी कहा जाता है) एक हिंदू कुल है, जिसके सदस्य विभिन्न समयों पर उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों पर शासन करते थे। तोमर अपनी वंशावली महाभारत काल के इंद्रप्रस्थ के पुरुवंशी वंश से बताते हैं।


Tomar Rajput History: तोमर (जिन्हें तोमर, तनवर और तुअर भी कहा जाता है) एक हिंदू कुल है, जिसके सदस्य विभिन्न समयों पर उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों पर शासन करते थे। तोमर अपनी वंशावली महाभारत काल के इंद्रप्रस्थ के पुरुवंशी वंश से बताते हैं।


इतिहास

  1. वंश: चंद्र वंश  
  2. वंशावली: सोम या चंद्र - ययाति - पुरु - हस्ती - अजीमिध - कुरु - शांतनु - विचित्रवीर्य - पांडु - अर्जुन - अभिमन्यु - परीक्षित - जनमेजय - तुंगपाल - अनंगपाल  
  3. शाखाएँ: पठानिया, जंजुआ, जराल, जंघारा, जातु, जारैता, सत्रौरा, रघु  
  4. शासन क्षेत्र: इंद्रप्रस्थ, उत्तर कुरु, दिल्ली, नूरपुर, तनवरावटी/तोरावटी, ग्वालियर, कायस्थपद, धौलपुर, तुअरगढ़  
  5. गोत्र: अत्रि/कश्यप/वायशुक  


पुराणों में उल्लिखित ऐतिहासिक वंशावलियों के अनुसार, तोमर पांडव राजकुमार अर्जुन के वंशज हैं, जो उनके परपोते सम्राट जनमेजय, सम्राट परीक्षित के पुत्र, के माध्यम से हैं। कुरु वंश के विचित्रवीर्य के अंधे जन्मे पुत्र धृतराष्ट्र ने अपने छोटे भाई पांडु के पक्ष में सिंहासन त्याग दिया था। बाद में राजा पांडु ने अपने बीमार स्वास्थ्य के कारण सिंहासन वापस अपने बड़े भाई को सौंप दिया। उनके पुत्रों ने एक महान युद्ध में हिस्सा लिया और अंततः युधिष्ठिर ने दुर्योधन को हराकर राजा बने। राजा युधिष्ठिर ने कुरु राज्य में इंद्रप्रस्थ शहर की स्थापना की और बाद में अपने भाई अर्जुन के पोते परीक्षित के पक्ष में त्यागपत्र दिया। महाभारत युद्ध के बाद राजधानी हस्तिनापुर बनी रही, जिसे बाद में बाढ़ ने प्रभावित किया और पांडव साम्राज्य की राजधानी राजा निशचक्र के समय में पूर्व की ओर स्थानांतरित हो गई। इंद्रप्रस्थ कई शताब्दियों तक कुरु-पांचाल साम्राज्य के प्रमुख शहरों में से एक बना रहा। कुरु राज्य 300 ईसा पूर्व के आसपास मगध साम्राज्य के अंतर्गत 16 महाजनपदों में से एक था। युधिष्ठिर के वंश में 28वें राजा क्षेमक को उनके मंत्रियों ने अपदस्थ कर दिया और उनके पुत्रों ने गोदावरी नदी के पास दक्षिण भारत में पुनर्स्थापित किया। उनके पोते उत्तुंगभुज ने गोदावरी के पास एक छोटा सा राज्य स्थापित किया और उनके वंशजों ने आठवीं शताब्दी ईस्वी में अनंगपाल तोमर I के तहत इंद्रप्रस्थ को पुनः स्थापित किया।


दिल्ली का तोमर वंश अनंगपाल तोमर II तक चला। उनकी विरासत का हिस्सा लाल कोट का निर्माण था, जो दिल्ली के चारों ओर एक किला-दीवार थी, संभवतः महमूद गजनवी के आक्रमणों के प्रतिकार के रूप में। यह दिल्ली की सबसे पुरानी रक्षा संरचनाओं में से एक है। अनंगपाल तोमर II ने अपने पोते (बेटी के पुत्र और अजमेर के राजा के पुत्र), पृथ्वीराज चौहान को उत्तराधिकारी नियुक्त किया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि पृथ्वीराज केवल अपने नाना के जीवनकाल में एक संरक्षक राजा थे। पृथ्वीराज को कभी दिल्ली में राज्याभिषेक नहीं किया गया, जिससे यह दृष्टिकोण प्रबल होता है कि चौहान शासक ने अपनी मातृभूमि के नाना से सिंहासन छीन लिया था। अनंगपाल तोमर II के 23 भाई थे और प्रत्येक के पास अपनी खुद की भूमि थी।


तोमर राजवंश का विस्तार


तोमर राजवंश का इतिहास उत्तर भारत के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उनके प्रभाव और शासन की गाथा है। यह राजवंश महाभारत काल से लेकर मध्ययुगीन भारत तक अपनी धरोहर और वीरता के लिए जाना जाता है। 


प्रारंभिक इतिहास


तोमर राजवंश के संस्थापक अनंगपाल I ने आठवीं शताब्दी ईस्वी में इंद्रप्रस्थ (आधुनिक दिल्ली) को पुनर्स्थापित किया। अनंगपाल के समय में, तोमर वंश ने दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में अपने शासन को मजबूत किया। अनंगपाल I ने इंद्रप्रस्थ को अपने राजधान के रूप में चुना और इसे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र बनाया।


अनंगपाल II और लाल कोट


अनंगपाल II, तोमर वंश के सबसे प्रमुख शासकों में से एक, ने दिल्ली में लाल कोट का निर्माण किया, जो कि एक मजबूत किला-दीवार थी। यह संरचना महमूद गजनवी के आक्रमणों के प्रतिकार के रूप में बनाई गई थी और यह दिल्ली की रक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। अनंगपाल II ने अपने शासनकाल में कई मंदिरों और जलाशयों का भी निर्माण करवाया, जो आज भी उनकी वास्तुकला और शासन की समृद्धि का प्रमाण हैं।


पृथ्वीराज चौहान का उदय


अनंगपाल II ने अपने पोते पृथ्वीराज चौहान को उत्तराधिकारी नियुक्त किया, जो अजमेर के राजा का पुत्र था। पृथ्वीराज चौहान ने अनंगपाल II के बाद दिल्ली का शासन संभाला। हालांकि, पृथ्वीराज को दिल्ली का राजा घोषित नहीं किया गया था, जिससे यह माना जाता है कि वह केवल एक संरक्षक के रूप में शासन कर रहे थे। पृथ्वीराज चौहान ने अपनी वीरता और नेतृत्व क्षमता से चौहान वंश को एक नई ऊंचाई तक पहुंचाया।


ग्वालियर और अन्य क्षेत्र


तोमर राजवंश ने केवल दिल्ली तक ही नहीं बल्कि ग्वालियर और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भी अपना शासन स्थापित किया। ग्वालियर में तोमर शासकों ने कई किलों, मंदिरों और अन्य महत्वपूर्ण संरचनाओं का निर्माण किया, जो आज भी भारतीय इतिहास और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ग्वालियर का किला, जिसे तोमर राजाओं ने मजबूत किया, भारत के सबसे मजबूत और अजेय किलों में से एक माना जाता है।


तोमर वंश की शाखाएँ और गोत्र


तोमर वंश की कई शाखाएँ हैं, जैसे पठानिया, जंजुआ, जराल, जंघारा, जातु, जारैता, सत्रौरा और रघु। इन शाखाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी पहचान और शक्ति स्थापित की। तोमर वंश के लोग विभिन्न गोत्रों से संबंधित हैं, जैसे अत्रि, कश्यप और वायशुक। इन गोत्रों ने तोमर वंश की सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता को बढ़ाया है।


तोमर वंश का पतन


तोमर वंश का पतन विभिन्न आक्रमणों और आंतरिक संघर्षों के कारण हुआ। पृथ्वीराज चौहान के शासनकाल के बाद, तोमर वंश ने धीरे-धीरे अपनी शक्ति खो दी। तुर्क और अफगान आक्रमणों ने तोमर वंश को कमजोर कर दिया और अंततः उन्हें दिल्ली और अन्य क्षेत्रों से विस्थापित होना पड़ा।


निष्कर्ष


तोमर वंश भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसने उत्तर भारत में अपनी वीरता, शासन कला और सांस्कृतिक धरोहर को स्थापित किया। तोमर शासकों ने अपने समय में कई महत्वपूर्ण संरचनाओं का निर्माण किया और भारत के इतिहास में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनकी विरासत आज भी विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों, किलों और मंदिरों में जीवित है, जो उनकी महानता और साहस का प्रतीक हैं।



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